शिमला। हिमाचल विधानसभा में सोमवार को जयराम सरकार के वित्तीय प्रबंधन की पहली, नियंत्रक महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट पेश की गई। जिसके अनुसार जयराम सरकार के वित्त वर्ष 2018-19 में राजकोषीय घाटा पिछले वित्त वर्ष की तुलना में 358 करोड़ रुपये कम हुआ है। इसके साथ ही रिपोर्ट में सरकार के वित्तीय कुप्रबंधन पर भी सवाल खड़े किए गए हैं। 

रिपोर्ट में बताया गया है कि 5128 करोड़ से संबंधित 5758 उपयोगिता प्रमाणपत्र (यूसी) में से 1898 करोड़ से ज्यादा के 2407 प्रमाणपत्र जारी ही नहीं हो सके हैं। टूर आदि पर जाने के लिए दिए जाने वाले एडवांस को बनाई गई आकस्मिक बिलिंग व्यवस्था की निगरानी न होने से इस फंड के भी दुरुपयोग होने की आशंका है।

14 में से 11 स्वायत्त संस्थाओं ने वित्त वर्ष 2018-19 के अपने खाते सितंबर 2019 तक सीएजी को नहीं भेजे, जिसकी वजह से ऑडिट नहीं हो सका। इन सभी वजहों से सरकार के पैसे के खर्च की निगरानी न करने पर पैसे के दुरुपयोग और घपलों के होने की आशंका जताई गई है। 

रिपोर्ट के अनुसार 2018-19 में सरकार की राजस्व प्राप्तियां साल 2017-18 की तुलना में 13 फीसदी ज्यादा रही। 2017-18 में राजस्व 27,367 करोड़ था जबकि 2018-19 में यह 30,950 करोड़ रहा। इसमें 33 प्रतिशत राजस्व राज्य के अपने संसाधनों से आया जबकि 18 फीसदी केंद्रीय करों में राज्य की हिस्सेदारी और 49 फीसदी केंद्र सरकार से ग्रांट इन एड के रूप में मिला है। राज्य का कुल खर्च पिछले साल के 3181 करोड़ की तुलना में 10 फीसदी बढ़कर 34,493 रहा। राजकोषीय घाटे में वित्त वर्ष 2017-18 के 3,870 करोड़ की तुलना में वित्त वर्ष 2018-19 में 358 करोड़ रुपये की कमी दर्ज की गई है। 

रिपोर्ट में बताया गया है कि राज्य में पूंजीगत व्यय में 22 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई लेकिन कुल वित्तीय उधार में भी 2017-18 की तुलना में वित्त वर्ष 2018-19 में 6.41 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यह देनदारी राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) का 36 प्रतिशत और आय का 1.75 गुणा हो गई है। सार्वजनिक ऋण में भी पिछले वित्त वर्ष की तुलना में पांच फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्तमान में कुल 26,573 करोड़ के मार्केट लोन और उदय बाॅंड के लिए राज्य को अगले दस साल में 25,005 करोड़ के मूल और 12,521 करोड़ का ब्याज चुकाना होगा।  

रिपोर्ट में कहा गया है कि वित्तीय प्रबंधन सही न होने और बजट अनुमान सही न होने की वजह से अत्यधिक राशि खर्च या सरेंडर की गई है। 18 उप मद में 617.17 करोड़ का अतिरिक्त व्यय हुआ जबकि 12 उप मद में 196.22 करोड़ बच गए। 155 उप मद में 2,851 करोड़ के कुल प्रावधान में से 2328.5 करोड़ (78.87 फीसदी) राशि सरेंडर हो गई। विभिन्न स्कीमों के 60 मदों में तो शत-प्रतिशत राशि सरेंडर हुई जो 801.05 करोड़ थी।